भारत की संघीय शासन प्रणाली : परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण बिन्दु
भारतीय संविधान निर्माताओं द्वारा भारत की विशालता और विविधताओं को ध्यान में रखकर ही भारत की संघात्मक शासन प्रणाली को अपनाया था |भारतीय संविधान के भाग 1 में अनुच्छेद 1 से 4 तक संघ व राज्य के संबंध में ही प्रवधान किए गए है | यह प्रावधान भारतीय संघात्मक शासन प्रणाली को दर्शाता है |साथ ही भारतीय संविधान की ‘पहली अनुसूची’ में भी संघ व राज्य क्षेत्रों के नामों का उल्लेख किया गया है |
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 मे कहा गया है कि “भारत अर्थात इंडिया राज्यों का संघ होगा “|
भारतीय संविधान में “संघ” ( फेडरल )शब्द के स्थान पर “राज्यों का संघ “ ( यूनियन ऑफ दा स्टेटस ) शब्द का प्रयोग किया गया है |
- स्वतंत्रता के समय भारत 562 देशी रियासतों में बंटा हुआ था , जिनको सरदार पटेल और वी.पी.मेनन की सूझबूझ और प्रयासों द्वारा एकीकरण किया था |
- स्वतंत्रता के बाद देश के कई भागों में भाषा के आधार पर राज्यों के पुनर्गठन की मांग और आंदोलन हुए |
- 1 अक्टूबर1953 को भाषा के आधार पर आंध्र प्रदेश का गठन हुआ था | जो की भाषा के आधार पर पहला राज्य बना|
- 22 दिसंबर 1953 को फजल अली की अध्यक्षता में राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन किया गया था | इस आयोग में दो सदस्य के एम पन्निकर और हदयनाथ कुंजरू थे |
- भारतीय संविधान के 7 वें संविधान संशोधन 1956 द्वारा ( राज्यों की क, ख ,ग, घ, श्रेणी को समाप्त कर दिया ) 14 राज्य और 5 संघ राज्य क्षेत्रों में पुनर्गठन किया गया |
भारतीय संघीय प्रणाली की महत्वपूर्ण विशेषताएँ :-
भारत की संघीय शासन के संघात्मक लक्षण :-
1. संविधान की सर्वोच्चता का होना :- संघ व राज्यों की प्रत्येक विशेषता जैसे कार्यपालिका, विधायिका,न्यायपालिका संविधान द्वारा निर्धारित और संविधान द्वारा नियंत्रित होती है |2. शक्तियों का विभाजन होना :- केंद्र और राज्यों के मध्य शक्तियों का विभाजन किया गया है,जिसमे चार सूचियों में बांटा गया है –
(1) संघ सूची :- इस सूची के विषयों में कानून बनाने का अधिकार केवल संघ सरकार को है |
(2) राज्य सूची :- इस सूची के विषयों में कानून बनाने का अधिकार केवल राज्य सरकार को है |
(3) समवृति सूची :- इस सूची के विषयों में कानून बनाने का अधिकार संघ सरकार व राज्य सरकार दोनो को है | लेकिन विवाद की स्थिति में केंद्र सरकार का कानून ही माना जायेगा |
(4) अवशिष्ट विषय :- इस सूची में कानून बनाने का अधिकार केवल केंद्र सरकार को है| जैसे – साइबर कानून |
3. स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका का होना :- भारत में स्वतंत्र व निष्पक्ष न्यायपालिका की स्थापना की गई है | सर्वोच्च न्यायालय नागरिकों के अधिकारों का संरक्षक होने के साथ साथ संविधान का अंतिम व्याख्या कर्ता भी है |
4. उच्च सदन का होना :- भारतीय संसद का उच्च सदन राज्य सभा है, जो राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है | यह प्रतिनिधित्व समान ना होकर जनसंख्या के आधार पर है |
5. संशोधन प्रणाली का होना :- भारतीय संविधान में कुछ संशोधन विधेयक राष्ट्रपति के समक्ष प्रस्तुत करने से पहले आधे से अधिक राज्यों की सहमति आवश्यक होती है | यह विशेषता संघीय व्यवस्था के अनुरूप ही परिलक्षित होती है |
भारत की संघीय शासन के एकात्मक लक्षण :-
1. शक्तियों का वितरण केंद्र के पक्ष में होना :- संविधान निर्माताओं ने निश्चय ही केंद्र को शक्तिशाली बनाया गया है ताकि भारत की एकता और अखंडता को सुनिश्चित किया जा सके | केंद्र सरकार संघ सूची ,राज्य सूची,समवृति सूची,के साथ ही अवशिष्ट विषयों पर भी कानून बना सकती है |2. राज्यों में अलग संविधान का ना होना :- अमरीका के विपरीत भारत में राज्यों को पृथक संविधान बनाने की इजाजत नहीं है | हालांकि जम्मू कश्मीर एक अपवाद है जहाँ अनुच्छेद 370 के तहत अलग संविधान बना हुआ है | भारत में एक ही संविधान होगा जो हमारी एकता और अखंडता का प्रतीक है |
3. एकल नागरिकता का होना :- भारत में अमरीका की तरह दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है | संविधान में एकल नागरिकता का ही प्रावधान किया गया है ,जो हमारी एकता और अखंडता को सुनिश्चित करता है |
4. नवीन राज्योंका निर्माण व वर्तमान राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन का अधिकार केंद्र को होना :- भारतीय संसद को नवीन राज्यों का निर्माण करना , वर्तमान राज्यों की सीमाओं में परिवर्तन करना या किसी राज्य क्षेत्र में कमी या वृद्धि , नाम आदि का अधिकार प्रदान किया गया है|
5. आपातकाल में एकात्मक होना :- अर्थात भारत का संघीय ढाँचा आपातकाल में एकात्मक रूप ग्रहण कर लेता है | संविधान के अनुच्छेद 352 ( राष्ट्रीय आपातकाल ), 356 ( राज्यों का संवैधानिक तंत्र विफल होने पर ), 360 ( वित्तीय आपातकाल ) के दौरान केंद्र सरकार की शक्तियों में वृद्धि हो जाती है |
6. राज्यपालों की नियुक्ति :- राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और उन्हीं के प्रसाद पर्यन्त अपने पद पर बने रहते है |
7. राज्य सभा में समान प्रतिनिधित्व का ना होना :- भारतीय संविधान में उच्च सदन में राज्यों को समान प्रतिनिधित्व ना होकर जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया गया है |
8. एकल न्यायिक प्रणाली का होना :- भारत में अमरीका की दोहरी न्यायिक प्रणाली के स्थान पर एकल न्यायिक प्रणाली को अपनाया गया है | सर्वोच्च न्यायालय के बाद न्यायालयों का गठन पिरामिड के रूप में किया गया है |
9. सांविधानिक प्रावधान :- सम्पूर्ण भारत में एक नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नियुक्ति , वित्त आयोग,क्षेत्रीय परिषद,अनुसूचित आयोग ,अनुसूचित जन जाती आयोग , पिछड़ा वर्ग आयोग आदि द्वारा एकात्मक प्रणाली परिलक्षित होती है |
10.नीति आयोग ( पूर्व में योजना आयोग ):- भारत में नियोजित विकास की राजनीति के चलते संविधानेत्तर संस्थाओं की स्थापना की गई , जिसमे नीति निर्धारण के लिए नीति आयोग , राष्ट्रीय विकास परिषद आदि की भूमिका को देखा जा सकता है |
11. प्रधानमंत्री का करिश्माई नेतृत्व :- भारतीय राजनीति में करिश्माई व्यक्तित्व का महत्व निश्चय ही हमारी राजनीति और समाज में अलग ही छाप छोड़ता है | जैसे नेहरू , शास्त्री, इन्दिरा गाँधी, राजीव गाँधी ,आदि का नेतृत्व करिश्माई होने के कारण केंद्र का एकात्मक झुकाव देखने को मिला था |
Excellent material
ReplyDeleteबहुत अच्छा मेटर है
ReplyDeleteExcellent matter
ReplyDelete